जिम्मेदार कौन

  • December 17, 2019
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” जिम्मेदार कौन ”
भारतीय समाज में पारिवारिक ढांचा आजकल चरमराता सा दिखाई देता है। टूटते , बिखरते परिवारों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। इसके लिए कभी हम देश के कानून को, कभी कानून बनाने वालों को, तो कभी कानून लागू करने वालों या कहें तो सरकार, कोर्ट, पुलिस को या फिर आजकल के लड़के लड़कियों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं । क्या कभी हमने अपने अंदर झांक कर भी देखा है ।
इसके लिए क्या हम माँए भी तो कहीं जिम्मेदार नहीं हैं । जब हमारे पति अपने मां बाप पर खर्च करते थे तो हम बच्चों के सामने रोती थी कि देखो तुम्हारे पापा अपने परिवार पर तो इतना खर्च करते हैं और हम पर नहीं। हमनें बच्चों में सिर्फ मैं कि भावना भरी , हम की नहीं । न्यूक्लियर परिवार की भावना भरी , संयुक्त परिवार की नहीं। आज कल मां बाप को ये विचार अपने दिमाग से पूरी तरह निकाल देने चाहिए कि बुढापे में हमारे बच्चे हमारे साथ रहेंगे और हमारा ख्याल रखेंगें । बच्चे चाह कर भी हमारा ख्याल नहीं रख पायेंगे क्योंकि इस से उनका परिवार टूटने को आजायेगा। संयुक्त परिवार के सपने लेना बंद कर दीजिए।
एक पत्नी अपने पति से क्या अपेक्षा करती है इस पर तो हमने ढेरों पोस्ट पढ़ी और लिखी , परंतु पति की अपेक्षाओं के बारे मे चर्चा करना तो दूर सोचा भी नहीं। हमने ये तो शोर मचाया कि पति पत्नी के साथ दोस्त जैसा व्यवहार करे , पर यह नहीं जाना कि पति भी अपनी पत्नी से एक सच्चे दोस्त जैसे व्यवहार की अपेक्षा करता है । जिसे वो अपने मन की सब बातें बेझिझक बता सके। जिसके कंधे पर वो सिर रख के रो सके, जिसके साथ वो अपनी खुशींयाँ बांट सके। जो हर परेशानी में उसके साथ खड़ी हो । उसकी कमियों को अनदेखा करे , उसे प्रोत्साहित करे । उस पर विशवास रखे और उसका विशवास कभी टूटने न दे। इसी लिए पत्नी को अर्धांगिनी भी कहा गया है। बस स्त्री पुरूष की बराबरी की दोड़ मे लड़ते रहे। हमें यह तो याद रहा कि हम क्या चाहते हैं , ये सोचना भूल गए कि दूसरा क्या चाहता है।
हर पिता अपने बच्चों को सब सहूलियतें, सब सुख देना चाहता है इसमें वो भेदभाव नहीं करता। बच्चों को ऊंची से ऊंची शिक्षा देना चाहता है । वह अपनी बेटी के लिए एक आदर्श पिता बनना चाहता है उसे राजकुमारी की तरह पालना चाहता है। यह सब करते करते कब वह बेटे के साथ भेदभाव करने लगता है उसे खुद ही पता नहीं चलता। जब भी टूर पर जाना बच्चों के लिए कुछ न कुछ गिफ्ट लाना , खासकर बेटी के लिए, बेटे के लिए समझ नहीं आता कि उसे क्या चाहिए। शायद कभी अपने लिए कुछ खरीदा ही नहीं, या परिवार की जरूरतों के सामने अपनी जरूरतें नजर ही नहीं आई, बाजार भी तो लड़कियों के सामान से ही भरा हुआ था, लड़कों के लिए तो सिर्फ कुछ ही आपशन।
वो अपनी सभी अधूरी इच्छायों को बेटे के द्वारा पूरी होती देखना चाहता है । बेटे पर हमेशा अव्वल आने का दबाव बना रहता है जबकि बेटी इस सब दबाव से दूर । नतीजा बेटा पीछे रह जाता है और बेटी आगे। बेटे को दिन रात ताने सुनने पड़ते हैं और बेटी घर की Princess राजकुमारी बन जाती है। बेटा अन्दर ही अन्दर अपनी भावनाओं को समेटता जाता है और बेटी खुले आकाश में आगे बढ़ती है। बेटे को हमेशा आगे आने वाली जिम्मेदारियों के बारे में बताया जाता है परंतु बेटी के बारे में सोचते हैं कि वो अपने आप समय आने पर उठा लेगी। बेटे पर हमेशा यह दवाब रहता है कि उसे घर के लिए कमाना है , जबकि कमाना या न कमाना ये बेटी की इच्छा। बेटी को अगर कमाना भी है तो सिर्फ अपने लिए जबकि बेटे को पूरे परिवार के लिए , ऐसा क्यों। जब हम बेटे बेटी को बराबर का पढ़ाते हैं, बराबर की सुविधाएं देते हैं तो बराबर की जिम्मेदारी क्यों नहीं। अगर हम चाहते हैं कि लड़के घर के काम में बराबर का हाथ बटाएं, तो लड़कियां क्यों नहीं बराबर की कमाई घर में दें ।
हमने बच्चों को वो सभी स्वतंत्रता दी जो हम चाहते थे परंतु सीमायें बताना भूल गए। उसे शराब पीने की स्वतंत्रता तो दे दी लेकिन उसके कारण होश खोकर होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी नहीं दी। आजकल की जैनरेशन को “My Choice ” माई चाईस सटाईल का बना दिया । जिसके लिए सैक्स शादी से पहले हो या बाद में, पति के साथ करें या नहीं, शादी के अंदर ही करें या बाहर कहीं भी। क्या यह स्वतंत्रता आप अपने पति को देना चाहती हैं, तो फिर बेटी को क्यों ? कभी आपने यह सोचा है कि क्या ऐसी शादी टिक पाएगी । संयुक्त परिवार तो पहले ही टूट चुके हैं, ऐसे तो परिवार न्यूक्लियर से सिंगल हो जाएगा। एक तरह से शादी के मायने ही खत्म ।
यह सिक्के का वो दूसरा पहलू है , जिसे कोई देखना नहीं चाहता या देख कर भी अनजान बनता है। आगे आनेवाली पीढी का क्या होगा , जिसे मां बाप दोनो का प्यार ही नहीं मिल पाएगा । अगर हम आने वाली पीढ़ी को बचाना चाहते हैं तो हमें इस पर विचार करना होगा तथा कर्मो मे उनका समावेश करना होगा । जिससे कि आने वाली पीढियां खुशी खुशी सुख भरा जीवन व्यतीत कर सकें।
धन्यवाद।
इन्दर बीर कौर

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